जवाज़ ना मांगे कोई , ना कोई तशरीह ,
ज़माने की हो चाहे रिवायत कुछ भी ,
ये बयाँ करने में मुझे कोई हया नहीं ,
कि तू आफ़ताब बन गया है , अफ़सुर्दा ज़मीं पे मेरी
- S.S
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