Tuesday, 6 December 2016

रेहमत या रिश्वत ? (Blessing or Bribe)

बोल्दिया है अपनी ख्वाहिशों को मैंने,
(I have told my wishes)
और बेचैन होने की अब ज़रुरत नहीं,
(To stop fluttering)
समझगई है अब बहकती रूह भी,
('Cause drifting soul has also fathomed)
कि ज़िन्दगी की मुफ़्त मुस्कुराहटें ,
(That unearned smiles in life)
ख़ुदा की रेहमत नहीं,
(Are not blessings from God)
बल्कि ख़ुदा से दूरी बनी रेहने की रिश्वतें हैं.... 
(They are rather, bribe to keep one away from God)....

(c) S.S



Image result

Thursday, 17 November 2016

बंदिशें - Bounds

बंदिशें भी बड़ी दिलचस्प होती हैं,
 (Bounds are very interesting,)
एक तरफ़ तो रूह फ़रार होना चाहती है,
(When the soul wishes to escape,)
और इक तरफ़ बंधे बंधे फ़ना होजाने की ख़्वाहिश में है...
(And at the same time, wishes to be destroyed in chains....)

(c) S.S



Monday, 14 November 2016

ख़ामोशी

ख़ामोशी है ख़ुशी , अग़र बिन लफ़्ज़ की हो उम्मीद ,
पर बन जाती है बेबसी , जब हमराज़ कि हो कमी,
छुपाना ख़ूब आता है इस दिल को,
पर वो कुछ कहें तो सही.....

(c) S.S


........!

इत्तिफ़ाक़ हि तो है, जो दो लोग मिलजाते हैं,
जज़्बात हि तो हैं, जो रिश्ते रूहानी बनजाते हैं,
दो चार क़दम चलते हि, राहें एक हो जाती हैं,
और कुछ वादों के रहते, मंज़िलें भी मिलजाती हैं....

(c) S.S

Monday, 7 November 2016

................

ठेहेरजा ऐ मेरे ख़ुदा ,
ऐसी भी भला क्या नाराज़गी,
तक़दीर कि लक़ीरें अन्जान रास्ते बनगई हैं,
मेहेज़ इक मज़ाक सि रहगई हैं ज़िंदगी,
यक़ीन करें भी तो किसपर,
दुआएं भी झूठ सि लगती हैं,
सही ग़लत सब सिर्फ़ ग़लत है,
जहन्नुम से भी ख़ौफ़नाक लगती है अब ज़िंदगी.... 

(c) S.S

Wednesday, 2 November 2016

............

वक़्त से केहदो कि साँसों कि रफ़्तार से रीस ना करे,
क़श्ती पलटने में अभी कुछ देर है.... 

(c) S.S


Tuesday, 1 November 2016

................

कमी अल्फ़ाज़ों की नहीं ,
वक़्त की है ,
नमी ज़ख्मों की नहीं ,
जज़्बातों की है,
चोट लगने पर तो सब रोते हैं,
पर अश्क़ जो होकर भी ना बहें ,
अक़्सर इश्क़ की मुक़म्मल दास्ताँ वही बयाँ करते हैं........

(c) S.S





Thursday, 1 September 2016

हदें

किसने कहा कि बरदाश्त की हद होती है?
जब दर्द बेहद हो,
तो हदें ख़ुद ब ख़ुद बेहद होजाती हैं....

(c) S.S


Thursday, 16 June 2016

?

जज़्बाती हूँ, नासमझ नहीं,
पर तकलीफ देने वाले,
हर बार मात दे जाते हैं,

दायरों और लकीरों के दर्मियाँ ,
एक फ़िरती  रूह हूँ,
मेरी ख़ुश खल्की को कहीं,
कमज़ोरी तो नहीं समझलिया ?

(c) S.S


Monday, 30 May 2016

Untitled

इतना भि ना तोलो वादों को मेरे,
की हर मन्नत मिन्नत में बदल जाए

(c) Shilpa Sandesh 

Monday, 2 May 2016

मेरे जिस्म में बस्ती रूह

(c) शिल्पा सन्देश

क्या देखा है तुमने कभी ,
कोरे कागज़ का वह बहका टुकड़ा?
किस बेसब्री से इंतज़ार में होता है,
की कोई तोह उसपर भी ,
कुछ नामों निशाँ छोड़कर जाए,
किसी तरह तो उसका भी एक वजूद मिलजाए,

क्या देखी है कभी तुमने ,
बिन नीर के तड़पती, छटपटाती मछली ?
किस क़दर पानी पानी कहती है,
जैसे बिन आवाज़ के भी,
जी भर रोई हो,
इस नामुमकिन से ख्वाब में,
की शायद कहीं से कुछ बौछार,
जान की एक फूँक डालदे ,

ऐसी ही तो एक रूह हूँ मैं,
जो इस तलाश में भटकती रही ,
की शायद कोई शरीर उसे,
अपने क्वाबिल समझले,
पर कहाँ था मालूम की एक दिन,
किसी दूर देश से,
वह शक़्स मुझहे लेजाएगा ,
जिसके हर लफ्ज़ से ,
हर चीज़ का कारण मिल जाता है। .......





Thursday, 21 January 2016

Koi Farq Nahi....


(c) शिल्पा सन्देश


आवाज़ तो है वही,
पर बातें वो हैं नही,
जहाँ थी हवा में भी हंसी,
अब रहती हर वक़्त है नमी,

शिक़ायत भी करें तो किसे,
सुना है की सुनने के लिए भी,
ज़रुरत होती है दिल की,
पर जो हो चूका है पत्थर ,
अब उससे कहें भी तो क्या कहें,

तू तो है देखता सब कुछ,
गलत क्या और क्या है सही,
जीते तो पेड़ पौधे और पंछी भी हैं,
फिर मुझमे और उनमें,
कोई फ़र्क  नहीं....