Monday, 2 May 2016

मेरे जिस्म में बस्ती रूह

(c) शिल्पा सन्देश

क्या देखा है तुमने कभी ,
कोरे कागज़ का वह बहका टुकड़ा?
किस बेसब्री से इंतज़ार में होता है,
की कोई तोह उसपर भी ,
कुछ नामों निशाँ छोड़कर जाए,
किसी तरह तो उसका भी एक वजूद मिलजाए,

क्या देखी है कभी तुमने ,
बिन नीर के तड़पती, छटपटाती मछली ?
किस क़दर पानी पानी कहती है,
जैसे बिन आवाज़ के भी,
जी भर रोई हो,
इस नामुमकिन से ख्वाब में,
की शायद कहीं से कुछ बौछार,
जान की एक फूँक डालदे ,

ऐसी ही तो एक रूह हूँ मैं,
जो इस तलाश में भटकती रही ,
की शायद कोई शरीर उसे,
अपने क्वाबिल समझले,
पर कहाँ था मालूम की एक दिन,
किसी दूर देश से,
वह शक़्स मुझहे लेजाएगा ,
जिसके हर लफ्ज़ से ,
हर चीज़ का कारण मिल जाता है। .......





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