Monday, 29 September 2014

Kahun Kaise.....

कहूँ कैसे, कैसे कहूँ,
बयां ये दर्द कैसे करूँ;
हदों से भी हद 
हो चुकी है पार 
मुस्कुराना भी अब 
मैं भूल चुकी हूँ 

छुपा रखा था परदे में 
हर दर्द सिमटाकर रखा था 
धूल जमी है यादों की 
जिस चादर से ढंके रखा था 
उसपर सिलवटों का बोलबाला है 
बीती यादों ने अब तो 
हसरतों को भी जंग डाला है 

कहूँ कैसे, कैसे कहूँ 
बयां ये दर्द कैसे करूँ 

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