यह ज़िंदगी एक ऐसी सेहर है
अंजानी सी एक डगर है
फीकी पड़ती है जब रौशनी
आने वाला अंधेरों का पल है
पूछते हैं तारे भी अब
किधर तेरा हमसफ़र है ;
आाँखें बंद किये,
बेवजह गुम सी उसके खयालों में
उम्मीदों को बढाते हुए
बस चली जा रही हूँ ,
आखिर ज़िंदगी का दूसरा नाम सबर है
अंजानी सी एक डगर है
फीकी पड़ती है जब रौशनी
आने वाला अंधेरों का पल है
पूछते हैं तारे भी अब
किधर तेरा हमसफ़र है ;
आाँखें बंद किये,
बेवजह गुम सी उसके खयालों में
उम्मीदों को बढाते हुए
बस चली जा रही हूँ ,
आखिर ज़िंदगी का दूसरा नाम सबर है
Indeed thoughtful composition..just a small suggestion, it would surely enhance reader's experience if you also add the poem in Hindi script too.
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