मोहब्बत की ठोकर भी अजीब है,
इक बार सौ बार के बराबर है,
जब उससे मात पड़े जिसे सब कुछ देदिया हो,
तो फ़िर प्यार के नाम से भी काँप उठना जायज़ है,
हर उस इंसान से, जो रौशनी दिखाए,
दूरी बनाना जायज़ है,
यक़ीन करने की इक और क़ोशिश से ,
महरूम रेहना जायज़ है,
पर फड़फड़ाती रूह पर इतनी सख़्ती बरतना ,
क्या ये जायज़ है?
परों को यूँ हमेशा के लिए काट फैंकना ,
क्या ये जायज़ है?
ख़ुद को अँधेरों के दामन में मजबूरन ज़िंदा रखना ,
क्या ये जायज़ है?
(c) S.S

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