जज़्बाती हूँ, नासमझ नहीं,
पर तकलीफ देने वाले,
हर बार मात दे जाते हैं,
दायरों और लकीरों के दर्मियाँ ,
एक फ़िरती रूह हूँ,
मेरी ख़ुश खल्की को कहीं,
कमज़ोरी तो नहीं समझलिया ?
(c) S.S
पर तकलीफ देने वाले,
हर बार मात दे जाते हैं,
दायरों और लकीरों के दर्मियाँ ,
एक फ़िरती रूह हूँ,
मेरी ख़ुश खल्की को कहीं,
कमज़ोरी तो नहीं समझलिया ?
(c) S.S